इजाज़त कम थी जीने की मगर मोहलत ज़्यादा थी

इजाज़त कम थी जीने की मगर मोहलत ज़्यादा थी
हमारे पास मरने के लिए फ़ुर्सत ज़्यादा थी,

तअज्जुब में तो पड़ता ही रहा है आइना अक्सर
मगर इस बार उस की आँखों में हैरत ज़्यादा थी,

बुलंदी के लिए बस अपनी ही नज़रों से गिरना था
हमारी कम नसीबी हम में कुछ ग़ैरत ज़्यादा थी,

जवाँ होने से पहले ही बुढ़ापा आ गया हम पर
हमारी मुफ़्लिसी पर उम्र की उजलत ज़्यादा थी,

ज़माने से अलग रह कर भी मैं शामिल रहा इस में
मेंरे इंकार में इक़रार की नियत ज़्यादा थी..!!

मयस्सर मुफ़्त में थे आसमाँ के चाँद तारे तक
ज़मीं के हर खिलौने की मगर क़ीमत ज़्यादा थी,

वो दिल से कम ज़बाँ ही से ज़्यादा बात करता था
जभी उस के यहाँ गहराई कम वुसअत ज़्यादा थी..!!

~राजेश रेड्डी


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