जब भी तुम चाहो मुझे ज़ख्म नया देते रहो…

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जब भी तुम चाहो मुझे ज़ख्म नया देते रहो बाद में फिर मुझे सहने की दुआ देते रहो,

इश्क़ में जान से गुज़रते है गुज़रने वाले…

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इश्क़ में जान से गुज़रते है गुज़रने वाले मौत की राह नहीं देखते मरने वाले, आखिरी वक़्त भी

ग़ज़ल का हुस्न है और गीत का शबाब है वो…

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ग़ज़ल का हुस्न है और गीत का शबाब है वो नशा है जिसमे सुखन का वही शराब है

अब भी कहता हूँ कि तुम्हे घबराना नहीं है…

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अब भी कहता हूँ कि तुम्हे घबराना नहीं है घबरा कर कोई गलत क़दम उठाना नहीं है, हुनूज़

सोचता हूँ लहू तुम्हारा मैं गरमाऊँ किस तरह… ?

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सोचता हूँ लहू तुम्हारा मैं गरमाऊँ किस तरह ? ऐ मेरी कौम तुम्हे आख़िर मैं जगाऊँ किस तरह

रात पिघली है तेरे सुरमई आँचल की तरह…

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रात पिघली है तेरे सुरमई आँचल की तरह चाँद निकला है तुझे ढूँढने पागल की तरह, ख़ुश्क पत्तों

तुमको वहशत तो सीखा दी है गुज़ारे लायक…

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तुमको वहशत तो सीखा दी है गुज़ारे लायक और कोई हुक्म ? कोई काम हमारे लायक ? माज़रत

एक अनकही, ख़ामोश मुहब्बत पे बात कर…

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एक अनकही, ख़ामोश मुहब्बत पे बात कर जो कर सके तो बाप की चाहत पे बात कर, रखता

मुझे तन्हाई अपनी अब तुम्हारे नाम करना है…

मुझे तन्हाई अपनी अब

मुझे तन्हाई अपनी अब तुम्हारे नाम करना है बहुत मैं थक चुका हूँ अब मुझे आराम करना है,

सियासत ने बदला में’यार मुल्क में हुक्मरानी का…

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सियासत ने बदला में’यार मुल्क में हुक्मरानी का देश चलने लगा है पा कर इशारे अमीर घरानों से,