सोचता हूँ लहू तुम्हारा मैं गरमाऊँ किस तरह… ?

सोचता हूँ लहू तुम्हारा मैं गरमाऊँ किस तरह ?
ऐ मेरी कौम तुम्हे आख़िर मैं जगाऊँ किस तरह ?

क्या दलील पेश करूँ ? कौन गलत कौन सही ?
बस यही फ़िक्र है यकीं तुमको दिलाऊँ किस तरह ?

है मुमकिन मेरे नज़रिए से हो तुमको इख्तिलाफ़
मगर तुम्हे रहजनो के हवाले कर जाऊँ किस तरह ?

हम एक आज़ाद कौम है किसी के गुलाम नहीं
अब तुम्हे आज़ादी का मतलब मैं समझाऊँ किस तरह ?

चारो तरफ रहजन बैठे है घात लगाए हुए
ऐ मेरी कौम अब तुम्हे मैं बचाऊँ तो बचाऊँ किस तरह ?

वो जिसके लौ की हरारत तुम्हारे खून को गरमा दे
वो शोला ए शुजाअत मैं तुम में भड़काऊँ किस तरह…??

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