ये ज़हमत भी तो रफ़्ता रफ़्ता रहमत हो ही जाती है

ये ज़हमत भी तो रफ़्ता रफ़्ता रहमत हो ही जाती है
मुसलसल गम से गम सहने की आदत हो ही जाती है,

मसीहा हो अगर तुम सा तो ज़रूरत क्या है मरहम की
कि काँटों से भी तो ज़ख्मों की जराहत हो ही जाती है,

ताअल्लुक़ जिन से हो गिला उन पे आया ही करता है
मुहब्बत जिन से उनसे शिकायत हो ही जाती है,

ये ज़रूरी तो नहीं सूरज सवा नेज़े पर आ जाए
बदल जाए कोई अपना तो क़यामत हो ही जाती है..!!


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