ज़रा सी देर थी बस एक दिया जलाना था…

ज़रा सी देर थी बस एक दिया जलाना था
और इसके बाद फ़क़त आँधियों को आना था,

मैं घर को फूँक रहा था बड़े यक़ीन के साथ
कि तेरी राह में पहला क़दम उठाना था,

वरना कौन उठाता ये जिस्म ओ जाँ के अज़ाब
ये ज़िंदगी तो मोहब्बत का एक बहाना था,

ये कौन शख़्स मुझे किर्चियों में बाँट गया
ये आइना तो मेरा आख़िरी ठिकाना था,

पहाड़ भाँप रहा था मेरे इरादे को
वो इस लिए भी कि तेशा मुझे उठाना था,

बहुत सँभाल के लाया हूँ एक सितारे तक
ज़मीन पर जो मेरे इश्क़ का ज़माना था,

मिला तो ऐसे कि सदियों की आश्नाई हो
तआरुफ़ उससे भी हालाँकि ग़ाएबाना था,

मैं अपनी ख़ाक में रखता हूँ जिसको सदियों से
ये रौशनी भी कभी मेरा आस्ताना था,

मैं हाथ हाथों में उसके न दे सका था ‘शुमार’
वो जिसकी मुट्ठी में लम्हा बड़ा सुहाना था..!!

~अख्तर शुमार

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