कभी झूठे सहारे ग़म में रास आया…

कभी झूठे सहारे ग़म में रास आया नहीं करते
ये बादल उड़ के आते हैं मगर साया नहीं करते,

यही काँटे तो कुछ ख़ुद्दार हैं सेहन ए गुलिस्ताँ में
कि शबनम के लिए दामन तो फैलाया नहीं करते,

वो ले लें गोशा ए दामन में अपने या फ़लक चुन ले
मेरी आँखों में आँसू बार बार आया नहीं करते,

सलीक़ा जिन को होता है ग़म ए दौराँ में जीने का
वो यूँ शीशे को हर पत्थर से टकराया नहीं करते,

जो क़ीमत जानते हैं गर्द ए राह ए ज़िंदगानी की
वो ठुकराई हुई दुनिया को ठुकराया नहीं करते,

क़दम मयख़ाना में रखना भी कार ए पुख़्ताकाराँ है
जो पैमाना उठाते हैं वो थर्राया नहीं करते,

नुशूर अहल ए ज़माना बात पूछो तो लरज़ते हैं
वो शा’इर हैं जो हक़ कहने से कतराया नहीं करते..!!

~नुशूर वाहिदी


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