नींदों का बोझ पलकों पे ढोना पड़ा मुझे
आँखों के इल्तिमास पे सोना पड़ा मुझे,
ता उम्र अपने काँधों पे बे गोर बे कफ़न
अपनी अना की लाश को ढोना पड़ा मुझे,
कमज़र्फ़ ना ख़ुदाओं के एहसाँ से बच गया
हालाँ कि कश्तियों को डुबोना पड़ा मुझे,
वो मेरी बेबसी पे कुछ इतना हँसा नवाज़
हँसने के एहतिराम में रोना पड़ा मुझे..!!
~नवाज़ देवबंदी
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