अपने घर की चारदीवारी में अब लिहाफ़ में भी सिहरन होती है
जिस दिन से किसी को गुर्बत में सड़को पर ठिठुरते देखा है,
पहले छोटी छोटी ख़ुशियों को सब मिल कर साथ मनाते थे
आज कल छोटे छोटे आँगन में रिश्तो को सिमटते देखा है,
तुम आज भी मेरे अपने हो शायद इन्सान हो और ज़माने के
वरना यहाँ मौसम से पहले हमने अपनों को बदलते देखा है,
किस बात पे तू इतराता है ? यहाँ वक़्त से बड़ा तो कुछ भी नहीं
कभी तारों से जगमग आसमाँ में सितारों को टूटते देखा है..!!
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