हर वक़्त किसी को मुकम्मल नज़ारा नहीं मिलता

हर वक़्त किसी को मुकम्मल नज़ारा नहीं मिलता
उम्मीद जब रखो तो कहीं किनारा नहीं मिलता,

वफाओं के किस्से तो बस किताबों में रह गए
साफ नीयत के आदमी को सहारा नहीं मिलता,

गम न कर कि रह गए तेरे अरमां कुछ अधूरे
ख्वाहिशें छूट भी जाती है हक़ सारा नहीं मिलता,

जो शय है मयस्सर तुझे उसे सीने से लगा ले
यूँ हाथ आसमां में उठाने से सितारा नहीं मिलता,

लोग करीब आएँगे भी तो मतलब की ही खातिर
हर किसी को ज़िंदगी मे शख्स प्यारा नहीं मिलता,

हुनरमंद बनने की खातिर देनी पड़ती है कुर्बानियाँ
यूँ ही तो ज़माने में तज़ुर्बे का पिटारा नहीं मिलता..!!


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