खून अपना हो या पराया हो
नस्ल ए आदम का खून है आखिर,
जंग मशरिक़ में हो कि मगरिब में
अमन ए आलम का खून है आख़िर,
बम घरो पर गिरे कि सरहद पर
रूह तामीर ए ज़ख्म खाती है,
खेत अपने जले या गैरो के
ज़ीस्त फाकों से तिलमिलाती है..!!
➤ आप इन्हें भी पढ़ सकते हैं

दयार ए दाग़ ओ बेख़ुद शहर ए देहली छोड़ कर तुझ को

किसी के इश्क़ में रस्तों की धूल हो गए हैं…

मेरे दोस्त, ऐ मेरे प्यारे अभी बात है अधूरी…

सारी बस्ती में ये जादू नज़र आए मुझको

जो वफ़ा का रिवाज रखते हैं…

अब वो झोंके कहाँ सबा जैसे आग है शहर की हवा जैसे

गर्दिश ए साग़र सुबू के दरमियाँ

रहते थे कभी जिन के दिल में हम

कोई सिपाही नहीं बच सका निशानों से

और सब भूल गए हर्फ़ ए सदाक़त लिखना
Discover more from Bazm e Shayari :: बज़्म ए शायरी -Hindi / Urdu Poetry, Ghazals, Shayari
Subscribe to get the latest posts sent to your email.



















