खून अपना हो या पराया हो
नस्ल ए आदम का खून है आखिर,
जंग मशरिक़ में हो कि मगरिब में
अमन ए आलम का खून है आख़िर,
बम घरो पर गिरे कि सरहद पर
रूह तामीर ए ज़ख्म खाती है,
खेत अपने जले या गैरो के
ज़ीस्त फाकों से तिलमिलाती है..!!
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इस तरह गुम हूँ ख़यालों में कुछ एहसास नहीं

ख़्वाहिशों का इम्तिहाँ होने तो दो

वो जो था वो कभी मिला ही नहीं

दश्त की धूप है जंगल की घनी रातें हैं

अपनी ज़रूरत के मुताबिक़….

हर एक बात न क्यूँ ज़हर सी हमारी लगे

बुरी है कीजिए नफ़रत निहायत

ख़ुशबू जैसे लोग मिले अफ़्साने में

नसीबो पर नहीं चलते नजीरों पर नहीं चलते…

हमें शुऊर ए जुनूँ है कि जिस चमन में रहे



















