खून अपना हो या पराया हो
नस्ल ए आदम का खून है आखिर,
जंग मशरिक़ में हो कि मगरिब में
अमन ए आलम का खून है आख़िर,
बम घरो पर गिरे कि सरहद पर
रूह तामीर ए ज़ख्म खाती है,
खेत अपने जले या गैरो के
ज़ीस्त फाकों से तिलमिलाती है..!!
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अहल ए उल्फ़त के हवालो पे हँसी आती है…

सफ़र ए मंज़िल ए शब याद नहीं

बदन और रूह में झगड़ा पड़ा है

तेरे बदन से जो छू कर इधर भी आता है

ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो

ग़ुरूब ए शाम ही से ख़ुद को यूँ महसूस करता हूँ

अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा

दर्द हो, दुःख हो तो दवा कीजिए…

ये बेड़ियाँ मेरे पाँव में तुम पहना तो रहे हो

हर घड़ी चश्म ए ख़रीदार में रहने के लिए
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