खून अपना हो या पराया हो
नस्ल ए आदम का खून है आखिर,
जंग मशरिक़ में हो कि मगरिब में
अमन ए आलम का खून है आख़िर,
बम घरो पर गिरे कि सरहद पर
रूह तामीर ए ज़ख्म खाती है,
खेत अपने जले या गैरो के
ज़ीस्त फाकों से तिलमिलाती है..!!
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काश मैं तुझ सा बेवफ़ा होता

आसमान से इनायतें न तुझे मिलीं न मुझे मिलीं

आ जाओ मैं लोरी गा के सुना देता हूँ…

परिंदा समझ कर शिकार कर गई

हसीन रुत में…उदास क्यों हो ?

तुम्हे न फिर से सताएँगे हम, ख़ुदा हाफिज़…

मुझको पागल कहने वाला ख़ुद ही पागल हो जाएगा…

ज़रीदे में छपी है एक ग़ज़ल दीवान जैसा है…

अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा

आँखों का था क़ुसूर न दिल का क़ुसूर था…


















