खून अपना हो या पराया हो
नस्ल ए आदम का खून है आखिर,
जंग मशरिक़ में हो कि मगरिब में
अमन ए आलम का खून है आख़िर,
बम घरो पर गिरे कि सरहद पर
रूह तामीर ए ज़ख्म खाती है,
खेत अपने जले या गैरो के
ज़ीस्त फाकों से तिलमिलाती है..!!
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किया हम ने जो उन से कुछ ख़िताब आहिस्ता आहिस्ता

जंगल काट दिए और फिर शहर भी जला दिए

चश्म देखूँ न मैं उस की न ही अबरू देखूँ

हम हैं मता ए कूचा ओ बाज़ार की तरह

हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुक़द्दर मेरा

तेरे उकताते हुए लम्स से महसूस हुआ…

तुम शुजाअत के कहाँ क़िस्से सुनाने लग गए

सर ए मिंबर वो ख़्वाबों के महल तामीर करते हैं

तेरे ख़याल से लो दे उठी है तन्हाई

मोहब्बत में वफ़ादारी से बचिए



















