अव्वलीं चाँद ने क्या बात सुझाई मुझ को
याद आई तेरी अंगुश्त ए हिनाई मुझ को,
सर ए ऐवान ए तरब नग़्मा सरा था कोई
रात भर उस ने तेरी याद दिलाई मुझ को,
देखते देखते तारों का सफ़र ख़त्म हुआ
सो गया चाँद मगर नींद न आई मुझ को,
इन्ही आँखों ने दिखाए कई भरपूर जमाल
इन्हीं आँखों ने शब ए हिज्र दिखाई मुझ को,
साए की तरह मेरे साथ रहे रंज ओ अलम
गर्दिश ए वक़्त कहीं रास न आई मुझ को,
धूप इधर ढलती थी दिल डूबता जाता था इधर
आज तक याद है वो शाम ए जुदाई मुझ को,
शहर ए लाहौर तेरी रौनक़ें दाइम आबाद
तेरी गलियों की हवा खींच के लाई मुझ को..!!
~नासिर काज़मी
कुछ तो एहसास ए ज़ियाँ था पहले
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