गुल तेरा रंग चुरा लाए है गुलज़ारो में
जल रहा हूँ भरी बरसात की बौछारों में,
मुझसे कतरा के निकल जा मगर ऐ जान ए हया
दिल की लौ देख रहा हूँ तेरी रुखसारो में,
हुस्न ए बेगाना ए एहसास ज़माल अच्छा है
गुन्चे खिलते है तो बिक जाते है बाज़ारों में,
ज़िक्र करते है तेरा मुझसे बाउन्वान ए ज़फ़ा
चारागर फूल पिरो लाए है तलवारों में,
ज़ख्म छुप सकते है लेकिन मुझे फन ही सौगंध
गम की दौलत भी है शामिल मेरे शहकारो में,
मुझको नफ़रत से नहीं प्यार से मसलूब करो
मैं तो शामिल हूँ मुहब्बत के गुनाहगारो में..!!
~अहमद नदीम
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