डरा के मौज ओ तलातुम से हम नशीनों को
यही तो हैं जो डुबोया किए सफ़ीनों को,
जमाल ए सुब्ह दिया रू ए नौ बहार दिया
मेरी निगाह भी देता ख़ुदा हसीनों को,
हमारी राह में आए हज़ार मयख़ाने
भुला सके न मगर होश के क़रीनों को,
कभी नज़र भी उठाई न सू ए बादा ए नाब
कभी चढ़ा गए पिघला के आबगीनों को,
यही जहाँ है जहन्नम यही जहाँ फ़िरदौस
बताओ आलम ए बाला के सैर बीनों को,
हुए हैं क़ाफ़िले ज़ुल्मत की वादियों में रवाँ
चराग़ ए राह किए ख़ूँ चकाँ जबीनों को,
तुझे न माने कोई तुझ को इस से क्या मजरूह
चल अपनी राह भटकने दे नुक्ता चीनों को..!!
~मजरूह सुल्तानपुरी
सब्ज़ हिकायत सुर्ख़ कहानी
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