मुसलसल बेकली दिल को रही है
मगर जीने की सूरत तो रही है,
मैं क्यूँ फिरता हूँ तन्हा मारा मारा
ये बस्ती चैन से क्यूँ सो रही है ?
चले दिल से उम्मीदों के मुसाफ़िर
ये नगरी आज ख़ाली हो रही है,
न समझो तुम इसे शोर ए बहाराँ
ख़िज़ाँ पत्तों में छुप कर रो रही है,
हमारे घर की दीवारों पे नासिर
उदासी बाल खोले सो रही है..!!
~नासिर काज़मी
फिर सावन रुत की पवन चली तुम याद आए
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