एक दिन बीवी ने फ़रमाया तुम्हारी हर किताब
फ़ालतू सामान है कूड़ा है रद्दी है जनाब,
आज कल महँगाई से मैं किस क़दर बदहाल हूँ
तुम इजाज़त दो अगर रद्दी में इनको बेच दूँ,
दफ़्न इन में इल्म ओ फ़न के हैं हज़ारों माहताब
मैं ने बीवी से कहा नायाब है हर एक किताब,
देख ये दीवान ए ग़ालिब आप है अपनी मिसाल
इस का एक एक शेर है उर्दू अदब में ला ज़वाल,
देख हाली की मुसद्दस का नहीं कोई जवाब
ये भी है उर्दू अदब में एक बा मक़सद किताब,
और ये बाँग ए दरा इक़बाल की पहचान है
क्या ख़बर तुझ को ये उर्दू शायरी की शान है,
इंक़िलाबी इश्क़िया नज़्मों की कुल्लियात है
जोश की उर्दू अदब को क़ीमती सौग़ात है,
और ये है तल्ख़ियाँ साहिर का ला फ़ानी कलाम
उस से ही ज़िंदा रहेगा हश्र तक साहिर का नाम,
ये इकाई और आमद हैं किताबें बद्र की
नाक़िदों ने इन किताबों से ही उन की क़द्र की,
आग का दरिया है ये ये गर्दिश ए रंग ए चमन
इन कुतुब से है अयाँ उर्दू अदब का बाँकपन,
उम्र भर की है कमाई बेश ओ कम शहबाज़ की
देख ये हैं छे किताबें मोहतरम शहबाज़ की,
देख ये फ़ारूक़ भाई की किताबें बेशुमार
नस्र भी है मुस्तनद और नज़्म भी है बा वक़ार,
देख तालिब की किताबें पहला पत्थर सिलसिला
लफ़्ज़ ए सादा में छुपा है ज़िंदगी का फ़ल्सफ़ा..!!
~अहमद अल्वी