सुना है रोज़ वो हम को सँवर के देखते हैं
ये बात सच है तो उन पे भी मर के देखते हैं,
सुना है लोगों से महबूब है मेरा गंजा
चलो कि चाँद पे उस की उतर के देखते हैं,
करेंगे आँख मटक्का वो क्या पड़ोसन से ?
जो लोग अपनी ही बीवी को डर के देखते हैं,
सुना है शौक़ है उस को भी पहलवानी का
चलो कि उस से भी दो हाथ कर के देखते हैं,
सुना है चश्मा लगाता नहीं गधा कोई
ये बात है तो हरी घास चर के देखते हैं,
गए ज़माने की बातें हैं शक्ल और सूरत
बस अब तो अहल ए नज़र ख़म कमर के देखते हैं,
सुना है प्यार है उस को क्लीन चेहरों से
सो हम भी चेहरे से दाढ़ी कतर के देखते हैं..!!
~अहमद अल्वी
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