राहज़न आदमी रहनुमा आदमी
बार हा बन चुका है ख़ुदा आदमी,
हाए तख़्लीक़ की कार पर्दाज़ियाँ
ख़ाक सी चीज़ को कह दिया आदमी,
खुल गए जन्नतों के वहाँ ज़ाइचे
दो क़दम झूम कर जब चला आदमी,
ज़िंदगी ख़ानक़ाह ए शहूद ओ बक़ा
और लौह ए मज़ार ए फ़ना आदमी,
सुब्ह दम चाँद की रुख़्सती का समाँ
जिस तरह बहर में डूबता आदमी,
कुछ फ़रिश्तों की तक़्दीस के वास्ते
सह गया आदमी की जफ़ा आदमी,
गूँजती ही रहेगी फ़लक दर फ़लक
है मशिय्यत की ऐसी सदा आदमी,
आस की मूरतें पूजते पूजते
एक तस्वीर सी बन गया आदमी..!!
~साग़र सिद्दीक़ी
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