वो चराग़ ए जाँ कि चराग़ था कहीं रहगुज़ार में बुझ गया
मैं जो एक शो’लानज़ाद था हवस ए क़रार में बुझ गया,
मुझे क्या ख़बर थी तेरी जबीं की वो रौशनी मेरे दम से थी
मैं अजीब सादा मिज़ाज था तेरे ए’तिबार में बुझ गया,
मुझे रंज है कि मैं मौसमों की तवक़्क़ुआत से कम रहा
मेरी लौ को जिस में अमाँ मिली मैं उसी बहार में बुझ गया,
वो जो लम्स मेरी तलब रहा वो झुलस गया मेरी खोज में
सो मैं उस की ताब न ला सका कफ़ ए दाग़दार में बुझ गया,
जिन्हें रौशनी का लिहाज़ था जिन्हें अपने ख़्वाब पे नाज़ था
मैं उन्ही की सफ़ में जला किया मैं उसी क़तार में बुझ गया..!!
~इरफ़ान सत्तार
मज्लिस ए ग़म, न कोई बज़्म ए तरब, क्या करते
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