तेरी आँखों का अजब तुर्फ़ा समाँ देखा है
एक आलम तेरी जानिब निगराँ देखा है,
कितने अनवार सिमट आए हैं इन आँखों में
एक तबस्सुम तेरे होंटों पे रवाँ देखा है,
हम को आवारा ओ बेकार समझने वालो
तुम ने कब इस बुत ए काफ़िर को जवाँ देखा है,
सेहन ए गुलशन में कि अंजुम की तरबगाहों में
तुम को देखा है कहीं जाने कहाँ देखा है,
वही आवारा ओ दीवाना ओ आशुफ़्ता मिज़ाज
हम ने जालिब को सर ए कू ए बुताँ देखा है..!!
~हबीब जालिब
ये जो शब के ऐवानों में इक हलचल एक हश्र बपा है
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