सू ए मक़्तल कि पए सैर ए चमन जाते हैं

सू ए मक़्तल कि पए सैर ए चमन जाते हैं
अहल ए दिल जाम ब कफ़ सर ब कफ़न जाते हैं,

आ गई फ़स्ल ए जुनूँ कुछ तो करो दीवानो
अब्र सहरा की तरफ़ साया फ़गन जाते हैं,

उस को देखा नहीं तुम ने कि यही कूचा ओ राह
शाख़ ए गुल शोख़ी ए रफ़्तार से बन जाते हैं,

वो अगर बात न पूछे तो करें क्या हम भी
आप ही रूठते हैं आप ही मन जाते हैं,

बुलबुलो अपनी नवा फ़ैज़ है उन आँखों का
जिन से हम सीखने अंदाज़ ए सुख़न जाते हैं,

जो ठहरती तो ज़रा चलते सबा के हमराह
यूँ भी हम रोज़ कहाँ सू ए चमन जाते हैं,

लुट गया क़ाफ़िला ए अहल ए जुनूँ भी शायद
लोग हाथों में लिए तार ए रसन जाते हैं,

रोक सकता हमें ज़िंदान ए बला क्या मजरूह
हम तो आवाज़ हैं दीवार से छन जाते हैं..!!

~मजरूह सुल्तानपुरी

गो रात मेरी सुब्ह की महरम तो नहीं है

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