समुंदरों के लिए सीपियाँ बनाते थे

अजीब लोग थे वो तितलियाँ बनाते थे
समुंदरों के लिए सीपियाँ बनाते थे

वही बनाते थे लोहे को तोड़ कर ताला
फिर उस के बा’द वही चाबियाँ बनाते थे

मेरे क़बीले में ता’लीम का रिवाज न था
मेरे बुज़ुर्ग मगर तख़्तियाँ बनाते थे

फ़ुज़ूल वक़्त में वो सारे शीशागर मिल कर
सुहागनों के लिए चूड़ियाँ बनाते थे

हमारे गाँव में दो चार हिन्दू दर्ज़ी थे
नमाज़ियो के लिए वही टोपियाँ बनाते थे..!!

~लियाक़त जाफ़री

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