शर्मिंदगी में उम्र बसर कर रहे हैं हम
ये काम था तुम्हारा मगर कर रहे हैं हम,
पीना करो न बंद मुलाक़ात की शराब
मुद्दत के बाद तुम पे असर कर रहे हैं हम,
ऐसे भटक रहे हैं तुम्हारी तलाश में
दुनिया को लग रहा है सफ़र कर रहे हैं हम,
दिल सारी बात भूल गया सोचना भी मत
हँस हँस के तुझ से बात अगर कर रहे हैं हम,
तू शहर में नहीं है मगर इस के बावजूद
तेरी गली से रोज़ गुज़र कर रहे हैं हम..!!
~इब्राहीम अली ज़ीशान
हम एक रोज़ उस को भुलाने निकल गए
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