शहर सुनसान है किधर जाएँ

शहर सुनसान है किधर जाएँ
ख़ाक हो कर कहीं बिखर जाएँ

रात कितनी गुज़र गई लेकिन
इतनी हिम्मत नहीं कि घर जाएँ,

यूँ तेरे ध्यान से लरज़ता हूँ
जैसे पत्ते हवा से डर जाएँ,

उन उजालों की धुन में फिरता हूँ
छब दिखाते ही जो गुज़र जाएँ,

रैन अँधेरी है और किनारा दूर
चाँद निकले तो पार उतर जाएँ..!!

~नासिर काज़मी

गिरफ़्ता दिल हैं बहुत आज तेरे दीवाने

1 thought on “शहर सुनसान है किधर जाएँ”

Leave a Reply