सता लें हमको दिलचस्पी जो है उनकी सताने में
हमारा क्या वो हो जाएँगे रुस्वा ख़ुद ज़माने में,
लड़ाएगी मेरी तदबीर अब तक़दीर से पंजा
नतीज़ा चाहे जो कुछ हो मुक़द्दर आज़माने में,
जिसे भी देखिए है गर्दिश ए हालात से नाला
सुकुन ए दिल नहीं हासिल किसी को इस ज़माने में,
वो गुलचीं हो कि बिजली सबकी आँखों में खटकते है
यही दो चार तिनके जो है मेरे आशियाने में,
है कुछ लोगो की खसलत नौ ए इंसा की दिल आज़ारी
मज़ा मिलता है उनको दूसरो का दिल दुखाने में,
अज़ब दस्तूर ए दुनियाँ ए मुहब्बत है, अरे तौबा
कोई रोने में है मशगूल कोई मुस्कुराने में,
पतंगों को जला कर शमअ ए महफ़िल ऐ बर्की
दिखाने के लिए मसरूफ़ है आँसू बहाने में..!!
~अहमद अली बर्की
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