मुझे तन्हाई अपनी अब तुम्हारे नाम करना है…

मुझे तन्हाई अपनी अब तुम्हारे नाम करना है
बहुत मैं थक चुका हूँ अब मुझे आराम करना है,

अभी तो रात बाक़ी है सुना है दिन भी आएगा
अब हमको अपनी ज़िन्दगी को शाम करना है,

तुम्हारा नाम ले कर अब ज़माना हमसे मिलता है
मक़सद इस ख़राबे का तुम्हे बदनाम करना है,

क़िताब ए ज़ीस्त मैं अपनी तुम्हारे नाम लिखूँगा
जो दिल में राज़ ए पनाह है उन्हें अब आम करना है,

भला कैसे ये कोई रहबरों से अपने पूछेगा
है मंज़िल कौन सी अपनी, कहाँ क़याम करना है,

अज़ीब सी एक उलझन है मुझको तेरी बस्ती में
सलाम किसको करना है ? किसे परनाम करना है..??

 

 

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