मरीज़ ए इश्क़ का मर्ज़ वो बुखार बताते हैं…

मरीज़ ए इश्क़ का मर्ज़ वो बुखार बताते हैं
शख़्स एक है पर क़ातिल बेशुमार बताते हैं,

नशा छलकता है उनकी निगाहों में हरदम
इन मयकदों के नशे को वो खुमार बताते हैं,

इख़्तियार नहीं अपनी खिलाफ़त जताने का
और मेरी ख़ामोशी को वो इक़रार बताते हैं,

सुना है कहीं मोहब्बत के सौदे किए जाते हैं
और इन पैसों के सट्टे को ये बाज़ार बताते हैं,

नज़रे ही काफ़ी होती हैं इश्क़ पढ़ने के लिए
लफ़्ज़ों में किए हुए को वो इज़हार बताते हैं,

बड़ा सुकून मिला है उससे मुलाकात होने पे
और ये लोग आशिक़ को बेक़रार बताते हैं,

इस उधार की ज़िंदगी पर ही तो जीते हैं सब
वो महज़ पैसों के कर्ज़ों को उधार बताते हैं,

है कुछ तो रंजिश इन मकानों की आपस में
और फिर दूरियों की वजह दीवार बताते हैं,

बहुत नाज़ आने लगा है आजकल लोगों में
जिनसे हम ख़फ़ा हैं वहीं हमें बेज़ार बताते हैं,

बड़े नादान हैं ये हमारे जहाँ वाले ‘आबशार ‘
जिसमें वफ़ा ही न हो उसे भी प्यार बताते हैं..!!


Discover more from Bazm e Shayari :: बज़्म ए शायरी -Hindi / Urdu Poetry, Ghazals, Shayari

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply