लानत है तेरी ज़िन्दगी पे नहीं तू किसी काज का…

लानत है तेरी ज़िन्दगी पे नहीं तू किसी काज का
शक्ल ए इंसानी में छुपा तू इब्लीस के मिजाज़ का,

बेशर्म धोबी का कुत्ता है तू घर का न घाट का
बीबी भी जा चुकी है कह के दुश्मन आनाज का,

कहती थी तुम्हारी रोटी क्यों न कुत्तो को डाल दूँ ?
तू है सरासर निकम्मा बेगैरत नासुर इस समाज का..!!

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