ख़ून से लिखता है तावीज़ ए अजल काग़ज़ पर

ख़ून से लिखता है तावीज़ ए अजल काग़ज़ पर
वक़्त करता है अजब सिफली अमल काग़ज़ पर,

रंज मिटने का नहीं फिर भी तसल्ली के लिए
मिसरा ए दर्द की तरतीब बदल काग़ज़ पर,

ये तख़य्युल है कि उमडा हुआ दरिया कोई
मौजा ए आब ए रवाँ है कि ग़ज़ल काग़ज़ पर,

कितने जज़्बे तेरी बे राह रवी ने कुचले
हर्फ़ ए आवारा ज़रा देख के चल काग़ज़ पर,

खेतियाँ क्या क्या उगाता हूँ सर ए दश्त ए ख़याल
लहलहाता है कोई फूल न फल काग़ज़ पर,

लफ़्ज़ जब आ के चमकता है सर ए नोक ए क़लम
रौशनी देता है महताब ए अज़ल काग़ज़ पर,

जब कभी चाहा लिखूँ झील तेरी आँखों को
तैरने लगते हैं ख़ुशबू के कँवल काग़ज़ पर,

एक तस्वीर बना कर मैं तेरे होंटों की
सब्त कर दूँगा किसी याद के पल काग़ज़ पर,

तितलियाँ आने लगीं पुर्सा ए ग़म की ख़ातिर
तुझसे ये किसने कहा फूल मसल काग़ज़ पर,

रौशनाई को हमा गीर उजाले में बदल
अपनी फ़ितरत की सियाही तू न मल काग़ज़ पर,

और कुछ देर में ये रंग निकालेगी कई
ये जो बिखरी सी है नौख़ेज़ ग़ज़ल काग़ज़ पर..!!

~जुनेद आज़र


Discover more from Bazm e Shayari :: बज़्म ए शायरी -Hindi / Urdu Poetry, Ghazals, Shayari

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply