जो मिला उससे गुज़ारा न हुआ
जो हमारा था, वो हमारा न हुआ,
हम किसी और से मंसूब हुए
क्या ये नुक़सान तुम्हारा न हुआ,
बे तक़ल्लुफ़ भी वो हो सकते थे
मगर हमसे कोई इशारा न हुआ,
दोनों ही एक दूसरे पर मरते रहे
कोई भी अल्लाह को प्यारा न हुआ..!!
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हम आवारा गाँव गाँव बस्ती बस्ती फिरने वाले

तू क्या जाने रूह भी ज़ख़्मी होती है

कभी यूँ भी आ मेरी आँख में…

ठहरे जो कहीं आँख तमाशा नज़र आए

इश्क़ में जान से गुज़रते है गुज़रने वाले…

कश्ती हवस हवाओं के रुख़ पर उतार दे

हर एक शक्ल में सूरत नई मलाल की है

हिज़्र के मौसम में ये बारिश का बरसना…

जो मैं भी रूठा तो सुबह तक तू सजी सजाई पड़ी रहेगी

बहार की धूप में नज़ारे हैं उस किनारे
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