जो मिला उससे गुज़ारा न हुआ
जो हमारा था, वो हमारा न हुआ,
हम किसी और से मंसूब हुए
क्या ये नुक़सान तुम्हारा न हुआ,
बे तक़ल्लुफ़ भी वो हो सकते थे
मगर हमसे कोई इशारा न हुआ,
दोनों ही एक दूसरे पर मरते रहे
कोई भी अल्लाह को प्यारा न हुआ..!!
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यूँ न मिल मुझ से ख़फ़ा हो जैसे

इन्सान हूँ इंसानियत की तलब है

सुल्ह की हद तक सितमगर आ गया

धूप में सब रंग गहरे हो गए

मैं सोचता तो हूँ लेकिन ये बात किस से कहूँ

जब मुझको सब क़ुबूल था, तुम क्यों चले गए ?

ऐसा कोई लम्हा होता जिसमे तन्हा होते हम !

दौर ए ज़दीद में गुनाह ओ सवाब बिकते है

कुछ ग़म ए जानाँ कुछ ग़म ए दौराँ

कुछ लफ्ज़ अगर मुझे मिल जाएँ….
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