जो मिला उससे गुज़ारा न हुआ
जो हमारा था, वो हमारा न हुआ,
हम किसी और से मंसूब हुए
क्या ये नुक़सान तुम्हारा न हुआ,
बे तक़ल्लुफ़ भी वो हो सकते थे
मगर हमसे कोई इशारा न हुआ,
दोनों ही एक दूसरे पर मरते रहे
कोई भी अल्लाह को प्यारा न हुआ..!!
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सर ही अब फोड़िए नदामत में

ये है मयकदा यहाँ रिंद हैं यहाँ सब का साक़ी इमाम है…

अब जो लौटे हो इतने सालों में…

अगर तू साथ चल पड़ता सफ़र…

ये रुके रुके से आँसू ये दबी दबी सी आहें

मेरे ही लहू पर गुज़र औक़ात करो हो

आँखों से दूर सुब्ह के तारे चले गए

जब से आई है दीपावली

सहराओं में जा पहुँची है शहरों से निकल कर

दोस्ती का फ़रेब ही खाएँ
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