जो मिला उससे गुज़ारा न हुआ
जो हमारा था, वो हमारा न हुआ,
हम किसी और से मंसूब हुए
क्या ये नुक़सान तुम्हारा न हुआ,
बे तक़ल्लुफ़ भी वो हो सकते थे
मगर हमसे कोई इशारा न हुआ,
दोनों ही एक दूसरे पर मरते रहे
कोई भी अल्लाह को प्यारा न हुआ..!!
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सुना है इस मुहब्बत में बहुत नुक़सान होता है…

भीगा हुआ है आँचल आँखों में भी नमी है

रोज़मर्रा वही एक ख़बर देखिए…

किसी तरंग किसी सर ख़ुशी में रहता था…

इतना एहसान तो हम पर वो ख़ुदारा करते

फ़ैसले वो न जाने कैसे थे

हँसी में हक़ जता कर घर जमाई छीन लेता है

रस्सी तो जल गई मगर ऐंठन नहीं गई

बाम पर आता है हमारा चाँद

ये और बात है तुझ से गिला नहीं करते
















