कैसे कहे, क्या कहे इसी कशमकश में रह गए

कैसे कहे, क्या कहे इसी कशमकश में रह गए
हम अल्फाज़ ढूँढ़ते रहे, वो बात अपनी कह गए,

लोगो ने क्या कुछ न कहा, सब गँवारा कर लिया
हम इश्क़ की खातिर ज़माने के सितम भी सह गए,

बाक़ी न रही कोई तमन्ना न कुछ आरज़ू अपनी
सैलाब कुछ ऐसा चला कि अरमान भी सारे बह गए,

गुलशन में तो गवाह है हर शज़र उस तूफ़ान का
शाखों पे अब बस सहमे हुए से चंद पत्ते ही रह गए,

बड़ी उम्मीद से हमने गढ़े थे जो महल सपनो के
वो इमारत खंडहर बनी, खंडहर भी आख़िर ढह गए..!!


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