जो मिला उससे गुज़ारा न हुआ
जो हमारा था, वो हमारा न हुआ,
हम किसी और से मंसूब हुए
क्या ये नुक़सान तुम्हारा न हुआ,
बे तक़ल्लुफ़ भी वो हो सकते थे
मगर हमसे कोई इशारा न हुआ,
दोनों ही एक दूसरे पर मरते रहे
कोई भी अल्लाह को प्यारा न हुआ..!!
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जो चल सको तो कोई ऐसी चाल चल जाना…

उसने कहा कि मुझसे तुम्हें कितना प्यार है ?

देखे हुए किसी को बहुत दिन गुज़र गए

कोई सिपाही नहीं बच सका निशानों से

किसी तरंग किसी सर ख़ुशी में रहता था…

कभी लफ्ज़ भूल जाऊँ, कभी बात भूल जाऊँ…

शर्मिंदगी में उम्र बसर कर रहे हैं हम

जो डलहौज़ी न कर पाया वो ये…

तू ग़ज़ल बन के उतर बात मुकम्मल हो जाए…

ये आरज़ू थी तुझे गुल के रूबरू करते
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