जो मिला उससे गुज़ारा न हुआ
जो हमारा था, वो हमारा न हुआ,
हम किसी और से मंसूब हुए
क्या ये नुक़सान तुम्हारा न हुआ,
बे तक़ल्लुफ़ भी वो हो सकते थे
मगर हमसे कोई इशारा न हुआ,
दोनों ही एक दूसरे पर मरते रहे
कोई भी अल्लाह को प्यारा न हुआ..!!
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ग़ुरूब ए शाम ही से ख़ुद को यूँ महसूस करता हूँ

वो जो दिल में तेरा मुक़ाम है किसी और को वो दिया...

कितना सुकूत है रसन ओ दार की तरफ़

अक़्ल बड़ी है या फिर भालू दानिश वाले ग़ौर करें

दुनियाँ के लोग खुशियाँ मनाने में रह गए…

पढ़ती रहती हूँ मैं सारी चिट्ठियाँ…

कुछ बात है कि आज ख्याल ए यार आया

दिल ए नादान की बात थी और कुछ नहीं

अगर सफ़र में मेरे साथ मेरा यार चले…

दो जहाँ के हुस्न का अरमान आधा रह गया
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