इश्क़ ने बख्शी है हमें ये सौगात मुसलसल
तेरा ही ज़िक्र हमेशा तेरी ही बात मुसलसल,
एक मुद्दत हुई मुझे तेरे कूँचे से निकले हुए
होती रहती है फिर भी मुलाकात मुसलसल,
यादों से दिल्लगी दिल की लगी बन जाती है
जब तसव्वुर में गुजरती है हर रात मुसलसल,
तुम्हारी मुहब्बत में आज उस मुकाम पर हूँ
जहाँ मेरी ज़ात में रहती है तेरी ज़ात मुसलसल..!!
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मैं न कहता था कि शहरों में न जा यार मेरे

बारहा तुझ से कहा था मुझे अपना न बना

रंग ए नफ़रत तेरे दिल से उतरता है…

दिल को तेरे ध्यान में रखा

क्या सरोकार अब किसी से मुझे…

उस के पहलू से लग के चलते हैं

वो दिल की झील में उतरा था एक साअ’त को…

फ़सुर्दगी का मुदावा करें तो कैसे करें

कौन कहता है शरारत से तुम्हे देखते है…

पथरा गई आँखे तेरा इंतज़ार करते करते…



















