हमें शुऊर ए जुनूँ है कि जिस चमन में रहे
निगाह बन के हसीनों की अंजुमन में रहे,
तू ऐ बहार ए गुरेज़ाँ किसी चमन में रहे
मेरे जुनूँ की महक तेरे पैरहन में रहे,
मुझे नहीं किसी उसलूब ए शाइरी की तलाश
तेरी निगाह का जादू मेरे सुख़न में रहे,
न हम क़फ़स में रुके मिस्ल ए बू ए गुल सय्याद
न हम मिसाल ए सबा हल्क़ा ए रसन में रहे,
खुले जो हम तो किसी शोख़ की नज़र में खुले
हुए गिरह तो किसी ज़ुल्फ़ की शिकन में रहे,
सरिश्क रंग न बख़्शे तो क्यूँ हो बार ए मिज़ा
लहू हिना नहीं बनता तो क्यूँ बदन में रहे ?
हुजूम ए दहर में बदली न हम से वज़ ए ख़िराम
गिरी कुलाह हम अपने ही बाँकपन में रहे,
ये हुक्म है रहे मुट्ठी में बंद सैल ए नसीम
ये ज़िद है बहर ए तपाँ कूज़ा ए कुहन में रहे,
ज़बाँ हमारी न समझा यहाँ कोई मजरूह
हम अजनबी की तरह अपने ही वतन में रहे..!!
~मजरूह सुल्तानपुरी
मुझ से कहा जिब्रील ए जुनूँ ने ये भी वहइ ए इलाही है
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