अगर चाहते हो तुम सदा मुस्कुराना
कभी अपनी माँ का दिल न दुखाना,
करो अपनी माँ की हमेशा गुलामी
फिर नौकर बनेगा तुम्हारा ज़माना,
गुस्सा न करना कभी अपनी माँ से
हमेशा मुहब्बत से तुम उनको बुलाना,
ख़ुशी से अपनी माँ की हर एक बात मानो
यक़ीनन ज़न्नत में बनेगा तुम्हारा ठिकाना,
चलेगी आसमानों पर तारीफ़ तुम्हारी
कभी अपना गुस्सा न माँ को दिखाना..!!
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चुना था उन की मोहब्बत ने आज़मा के मुझे

दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला

फूल का शाख़ पे आना भी बुरा लगता है

देखो अभी लहू की एक धार चल रही है

जाने कितनी उड़ान बाक़ी है

अचानक दिलरुबा मौसम का दिल आज़ार हो जाना…

कश्ती हवस हवाओं के रुख़ पर उतार दे

हासिल हुई जब से आरज़ी शोहरते…

दुनियाँ ए अक़ीदत में अजब रस्म चली है

वफ़ा ए वादा नहीं वादा ए दिगर भी नहीं…


















