हक़ीर जानता है इफ्तिखार माँगता है

हक़ीर जानता है इफ्तिखार माँगता है
वो ज़हर बाँटता है और प्यार माँगता है,

ज़लील कर के रख दिया जिसने ख़ुद ही
गैरो के बीबी का हक़ वो ख़्वार मांगता है,

कर दिया हवाले उसके वतन की लाज
गिरेबाँ जो सब के ही तार तार माँगता है,

बिछा रखा है जिसने सबकी राह में काँटे
सिले में लोगो से फूलो का हार माँगता है,

ख़ुद के वायदे भी अपने जो निभा न सका
माफ़ी तक ना कभी वो शर्मसार माँगता है,

छीन कर मुफलिसों के मुँह का निवाला
फिर वो अमीर ए शहर ऐतबार माँगता है,

अहल ए सियासत के बस का ये रोग नहीं
अब मुल्क ज़दीद कोई शहसवार माँगता है,

वैसे तो रोज़ ही ज़ुल्फे तेरी सँवारा करता है
है ये ख़्वाब अच्छा मगर इंतज़ार माँगता है,

नवाब उन पे मेरा नगमा कारगर ही नहीं
ये गीत वो है कि जो दिल के तार माँगता है..!!

~नवाब ए हिन्द


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