एक दिन ख़ुद को अपने पास बिठाया हमने
पहले यार बनाया फिर समझाया हमने,
ख़ुद भी आख़िर कार उन्ही वा’दों से बहले
जिनसे सारी दुनिया को बहलाया हमने,
भीड़ ने यूँही रहबर मान लिया है वर्ना
अपने अलावा किस को घर पहुँचाया हमने,
मौत ने सारी रात हमारी नब्ज़ टटोली
ऐसा मरने का माहौल बनाया हमने,
घर से निकले चौक गए फिर पार्क में बैठे
तन्हाई को जगह जगह बिखराया हमने,
इन लम्हों में किसकी शिरकत कैसी शिरकत
उसे बुला कर अपना काम बढ़ाया हमने,
दुनिया के कच्चे रंगों का रोना रोया
फिर दुनिया पर अपना रंग जमाया हमने,
जब ‘शारिक़’ पहचान गए मंज़िल की हक़ीक़त
फिर रस्ते को रस्ते भर उलझाया हमने..!!
~शारिक़ कैफ़ी
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