हुई न खत्म तेरी रह गुज़ार क्या करते…

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हुई न खत्म तेरी रह गुज़ार क्या करते तेरे हिसार से ख़ुद को फ़रार क्या करते ? सफ़ीना

एक लफ़्ज़ ए मोहब्बत का अदना ये फ़साना है…

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एक लफ़्ज़ ए मोहब्बत का अदना ये फ़साना है सिमटे तो दिल ए आशिक़ फैले तो ज़माना है,

इसी चमन में ही हमारा भी एक ज़माना था…

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इसी चमन में ही हमारा भी एक ज़माना था यहीं कहीं कोई सादा सा आशियाना था, नसीब अब

आदमी आदमी से मिलता है दिल मगर कम किसी से मिलता है…

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आदमी आदमी से मिलता है दिल मगर कम किसी से मिलता है, भूल जाता हूँ मैं सितम उस

आँखों का था क़ुसूर न दिल का क़ुसूर था…

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आँखों का था क़ुसूर न दिल का क़ुसूर था आया जो मेरे सामने मेरा ग़ुरूर था, वो थे

अल्लाह अगर तौफ़ीक़ न दे इन्सान के बस का काम नहीं…

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अल्लाह अगर तौफ़ीक़ न दे इन्सान के बस का काम नहीं फ़ैज़ान ए मोहब्बत आम सही, इर्फ़ान ए

बड़ी क़दीम रिवायत है ये सताने की…

बड़ी क़दीम रिवायत है

बड़ी क़दीम रिवायत है ये सताने की करो कुछ और ही तदबीर आज़माने की, कभी तो फूट कर

जिसे तुम प्यार समझे थे वो कारोबार था हमदम…

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जिसे तुम प्यार समझे थे वो कारोबार था हमदम यहाँ सब अपने मतलब में मुहब्बत साथ रखते है,

जो मिला उससे गुज़ारा न हुआ…

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जो मिला उससे गुज़ारा न हुआ जो हमारा था, वो हमारा न हुआ,   हम किसी और से

पास आओ कि एक इल्तज़ा सुन लो…

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पास आओ कि एक इल्तज़ा सुन लो हाँ प्यार है तुमसे बेपनाह सुन लो, एक तुम्ही को तो