कभी लोग बदले कभी ठिकाना बदला…
कभी लोग बदले कभी ठिकाना बदला कभी सनम कभी सनम खाना बदला, साक़ी न मिल सका फिर भी
Love Poetry
कभी लोग बदले कभी ठिकाना बदला कभी सनम कभी सनम खाना बदला, साक़ी न मिल सका फिर भी
ऐ दिल ये तेरी ज़िद्द मुझे नादानी लगती है उसे पाने की उम्मीद अब बेमानी लगती है, क्यों
सितम सितम न रहा जब सनम सनम न रहा कुछ ऐसे दर्द ने घेरा कि गम भी गम
जाते जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया उम्र भर दोहराऊँगा ऐसी कहानी दे गया, उससे मैं कुछ
सोयें कहाँ थे आँखों ने तकिए भिगोये थे हम भी कभी किसी के लिए ख़ूब रोये थे, अँगनाई
विसाल ऐसे भी महँगा पड़ेगा दोनों को बिछड़ने के लिए मिलना पड़ेगा दोनों को, फिर ऐसे तर्क ए
उसने यूँ रास्ता दिया मुझको रास्ते से ही हटा दिया मुझको, दूर करने के वास्ते ख़ुद से ख़ुद
उम्र भर सीने में एक दर्द दबाए रखा एक बेनाम से रिश्ते को निभाए रखा, था मुझे वहम
कुछ एक रोज़ में मैं चाहतें बदलता हूँ अगर न सीट मिले तो बसें बदलता हूँ, हर एक
जुदाई में तेरी आँखों को झील करते हुए सुबूत ज़ाएअ’ किया है दलील करते हुए, मैं अपने आप