बसा बसाया शहर अब बंजर लग रहा है…

basa basaya shahar ab banzar lag raha hai

बसा बसाया शहर अब बंजर लग रहा है चारो ओर उदासियो का मंज़र लग रहा है, जाने अंजाने

रोज़ जब रात को बारह का गजर होता है…

roj raat ko jab barah ka gajar hota hai

रोज़ जब रात को बारह का गजर होता है यातनाओं के अँधेरे में सफ़र होता है, कोई रहने

आँसू हो, उदासी हो और ख़ामोश चीत्कार हो…

aansoo ho udasi ho khamosh chitkar ho

आँसू हो, उदासी हो और ख़ामोश चीत्कार हो गज़ल कहनी हो तो पहले किसी से प्यार हो, कलम

हालात थे ख़राब या मैं ख़राब था…

halaat the kharab yaa main kharab tha

हालात थे ख़राब या मैं ख़राब था मेरे सवाल में शामिल जवाब था, ख़ुशी मेरी क़िस्मत ने छिनी

कभी लोग बदले कभी ठिकाना बदला…

saaqi na mil saka fir bhi use

कभी लोग बदले कभी ठिकाना बदला कभी सनम कभी सनम खाना बदला, साक़ी न मिल सका फिर भी

बदन पे जिसके शराफ़त का पैरहन देखा…

badan pe jiske sharafat ka pairahan dekha

बदन पे जिसके शराफ़त का पैरहन देखा वो आदमी भी यहाँ हमने बदचलन देखा, ख़रीदने को जिसे कम

क़िताब ए ज़ीस्त में ज़हमत के बाब इतने है…

zara si umr mili hai azab itne hai

क़िताब ए ज़ीस्त में ज़हमत के बाब इतने है ज़रा सी उम्र मिली है अज़ाब इतने है, ज़फ़ा,

टूट कर बिखरे हुए इन्सान कहाँ जाएँगे ?

tut kar bikhre hue insan kahan jayenge

टूट कर बिखरे हुए इन्सान कहाँ जाएँगे ? दूर तक सन्नाटा है नादान कहाँ जाएँगे ? रिश्ते जो

किसे ख़बर थी हवा राह साफ़ करते हुए…

kise khabar thi hawa raah saaf karte hue

किसे ख़बर थी हवा राह साफ़ करते हुए मेरा तवाफ़ करेगी तवाफ़ करते हुए, मैं ऐसा हँस रहा

मुसाफ़िर के रस्ते बदलते रहे…

musafir ke raste badalte rahe muqaddar me chalna tha chalte rahe

मुसाफ़िर के रस्ते बदलते रहे मुक़द्दर में चलना था चलते रहे, कोई फूल सा हाथ काँधे पे था