नज़र फ़रेब ए क़ज़ा खा गई तो क्या होगा

nazar fareb e qaza khaa gai

नज़र फ़रेब ए क़ज़ा खा गई तो क्या होगा हयात मौत से टकरा गई तो क्या होगा ?

चाँद पर बस्तियाँ तो बसा लोगे…

chaand par bastiyan to basa loge

चाँद पर बस्तियाँ तो बसा लोगे मगर चाँदनी कहाँ से लाओगे ? सलब कर लीं समाअतें सबकी किस

दुख दर्द के मारों से मेरा ज़िक्र न करना

dukh dard ke maaron se mera zikr

दुख दर्द के मारों से मेरा ज़िक्र न करना घर जाऊँ तो यारों से मेरा ज़िक्र न करना,

दयार ए नूर में तीरा शबों का साथी हो

dayaar e noor me teera shabo ka

दयार ए नूर में तीरा शबों का साथी हो कोई तो हो जो मेरी वहशतों का साथी हो,

बस्ती भी समुंदर भी बयाबाँ भी मेरा है

basti bhi samndar bhi bayabaan bhi

बस्ती भी समुंदर भी बयाबाँ भी मेरा है आँखें भी मेरी ख़्वाब ए परेशाँ भी मेरा है, जो

अज़ाब ये भी किसी और पर नहीं आया

azaab ye bhi kisi aur pe nahi aaya

अज़ाब ये भी किसी और पर नहीं आया कि एक उम्र चले और घर नहीं आया, उस एक

अज़ाब ए वहशत ए जाँ का सिला न माँगे कोई

azaab e wahshat e jaan ka sila na

अज़ाब ए वहशत ए जाँ का सिला न माँगे कोई नए सफ़र के लिए रास्ता न माँगे कोई,

मज़लूमों के हक़ मे अब आवाज़…

mazlumo ke haq me ab awaz

मज़लूमों के हक़ मे अब आवाज़ उठाये कौन ? जल रही बस्तियाँ,आह ओ सोग मनाये कौन ? कौन

ज़ुल्म की हद ए इंतेहा को मिटाने का वक़्त है

zulm ki had e inteha

ज़ुल्म की हद ए इंतेहा को मिटाने का वक़्त है अब मज़लूमों का साथ निभाने का वक़्त है,

कभी झूठे सहारे ग़म में रास आया…

kabhi jhuthe sahare gam me raas aaya nahi kar..

कभी झूठे सहारे ग़म में रास आया नहीं करते ये बादल उड़ के आते हैं मगर साया नहीं