मज़लूमों के हक़ मे अब आवाज़ उठाये कौन ?
जल रही बस्तियाँ,आह ओ सोग मनाये कौन ?
कौन करे पासदारी अब बेत अल मुक़दस की ?
सलाहुद्दीन अयुबी सा अब मुज़ाहिद लाये कौन ?
बस एक मज़म्मती बयान और कुछ नहीं
उम्मत ए मुसलमां को अब आ कर जगाये कौन ?
क्यूँ नहीं कोई झिंझोड़ता उन मुर्दा ज़मीरों को
आलम ए अरब ख़मोश है अब ये ज़ुल्म मिटाये कौन ?
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