बेतकल्लुफ़ मेरा है जान बनाता है मुझे…

बेतकल्लुफ़ मेरा है जान बनाता है मुझे
सामने तेरे कहाँ बोलना आता है मुझे,

वो उदासी कि बिखरने से नहीं बच सकता
और तेरा लम्स कि चुनता चला जाता है मुझे,

अब मेरे लौट के आने का कोई वक़्त नहीं
यूँ भी अब घर से सिवा कौन बुलाता है मुझे,

गीत ही सिर्फ़ लबों पर हो तो आ जाए भी नींद
वो कोई और कहानी भी सुनाता है मुझे,

क़त्अ कर के भी तअ’ल्लुक़ वो कहाँ चैन से है
इसके अस्बाब ओ दलाएल भी गिनाता है मुझे,

ख़ुद से वो कौन से शिकवे हैं कि जाते ही नहीं
अपने जैसों पे यक़ीं क्यूँ नहीं आता है मुझे ?

और एक बार ज़रा छेड़ मेरी रूह के तार
इन सुरों में तो कोई और भी गाता है मुझे,

एक तेरा दर्द है अच्छे हैं मरासिम जिससे
बस वही है कि जो पलकों पे बिठाता है मुझे,

मैं किसी दूसरे पहलू से उसे क्यूँ सोचूँ
यूँ भी अच्छा है वो जैसा नज़र आता है मुझे,

हो सबब कुछ भी मेरे आँख बचाने का मगर
साफ़ कर दूँ कि नज़र कम नहीं आता है मुझे,

नाख़ुदाओं ने तो ख़ुशफ़हमियाँ बख़्शी हैं फ़क़त
मैं हूँ ख़तरे में ये तूफ़ाँ ही बताता है मुझे..!!

~शारिक़ कैफ़ी


Discover more from Bazm e Shayari :: बज़्म ए शायरी -Hindi / Urdu Poetry, Ghazals, Shayari

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply