बड़े बड़े शहरों की अब यही पहचान है
ऊँची इमारतें और छोटे छोटे इन्सान है,
अहल ए शहर हो चुका है तंगदिल यहाँ
हर शख्स ख़ुद के हालात से परेशान है,
दौड़ते भागते ही ज़िस्म देखने को मिले
पल भर का न यहाँ किसी को आराम है,
मोबाइल में क़ैद हुआ पड़ा है बचपन
पार्क और गलियाँ यहाँ सभी सुनसान है,
धुँआ, मिट्टी और भीड़ में धक्का मुक्की
ये सब इनको मिले अनमोल वरदान है,
यूँ तो कहने को आबादी बड़ी शहरों की
पर हर एक अपने ही पड़ोसी से अंजान है,
देखने को तो चहल पहल है इन शहरों में
मगर ज़िन्दगी शहरियों की बड़ी वीरान है..!!
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