ख़बरें हुकुमत की क़ब्रें आवाम की…

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ख़बरें हुकुमत की क़ब्रें आवाम की हमको नहीं है लालच तुम्हारे इनाम की, बोया है तुमने जो भी

एक ज़ालिम उसपे क़हर आँखे दिखा रहा है…

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एक तो ज़ालिम उसपे क़हर आँखे दिखा रहा है अंज़ाम ए बेहया शायद अब नज़दीक आ रहा है,

गम ए वफ़ा को पस ए पुश्त डालना होगा…

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गम ए वफ़ा को पस ए पुश्त डालना होगा खटक रहा है जो काँटा निकालना होगा, फ़कीर ए

गुलाब चाँदनी रातों पे वार आये हम…

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गुलाब चाँदनी रातों पे वार आये हम तुम्हारे होंठों का सदका उतार आये हम, वो एक झील थी

हुई न खत्म तेरी रह गुज़ार क्या करते…

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हुई न खत्म तेरी रह गुज़ार क्या करते तेरे हिसार से ख़ुद को फ़रार क्या करते ? सफ़ीना

एक लफ़्ज़ ए मोहब्बत का अदना ये फ़साना है…

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एक लफ़्ज़ ए मोहब्बत का अदना ये फ़साना है सिमटे तो दिल ए आशिक़ फैले तो ज़माना है,

इसी चमन में ही हमारा भी एक ज़माना था…

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इसी चमन में ही हमारा भी एक ज़माना था यहीं कहीं कोई सादा सा आशियाना था, नसीब अब

आदमी आदमी से मिलता है दिल मगर कम किसी से मिलता है…

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आदमी आदमी से मिलता है दिल मगर कम किसी से मिलता है, भूल जाता हूँ मैं सितम उस

आँखों का था क़ुसूर न दिल का क़ुसूर था…

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आँखों का था क़ुसूर न दिल का क़ुसूर था आया जो मेरे सामने मेरा ग़ुरूर था, वो थे

अल्लाह अगर तौफ़ीक़ न दे इन्सान के बस का काम नहीं…

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अल्लाह अगर तौफ़ीक़ न दे इन्सान के बस का काम नहीं फ़ैज़ान ए मोहब्बत आम सही, इर्फ़ान ए