अश्क ओ खूं घुलते है तब दीदा ए तर बनती है
दास्ताँ इश्क़ में मरने से अमर बनती है,
चीख़ पड़ता है मुसव्विर सभी रंगों के साथ
कैनवस पर मेरी तस्वीर अगर बनती है,
इतना आसान नहीं होता है दिन का आना
डूब जाते है सितारे तो सहर बनती है,
सबको हासिल तो है बीनाई की दौलत लेकिन
देखने वाली तो मुश्किल से नज़र बनती है,
टकटकी बाँध के बैठे है वही रातो में
तेरी तस्वीर दीवारों पे जिधर बनती है,
पूछते फिर रहे है शहर में अब तो जानी
यार ! टूटी हुई तक़दीर किधर बनती है ?
~उमर सिद्दीकी
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