अल्फाज़ के झूठे बंधन में
आगाज़ के गहरे परों में
हर शख्स मुहब्बत करता है,
हालाकिं मुहब्बत कुछ भी नहीं
सब झूठे रिश्ते नाते हैं
सब दिल रखने की बातें हैं,
कब कौन किसी का होता है ?
सब असली रूप छुपाते हैं,
एहसास से खाली लोग यहाँ
लफ़्ज़ों के तीर चलाते हैं,
एक बार नज़र में आ के वो
फिर सारी उम्र रुलाते हैं,
खुलुस ओ मुहब्बत महर ओ वफ़ा
सब रस्मी रस्मी बातें हैं,
हर शख्स ख़ुद की मस्ती में
बस अपनी खातिर जीता है..!!
~अज्ञात
सू ए मक़्तल कि पए सैर ए चमन जाते हैं
➤ आप इन्हें भी पढ़ सकते हैं





























1 thought on “अल्फाज़ के झूठे बंधन में”