आबला पा कोई गुज़रा था जो पिछले सन में
सुर्ख़ काँटों की बहार आई है अब के बन में,
देखना रंग ए बदन यार के पैराहन में
चाँदनी दूध सी छिटकी है मेरे आँगन में,
देखना दीदावरो आमद ए तूफ़ान तो नहीं
टपकी है दर्द की एक बूँद मेरे दामन में,
मैं हम आग़ोश ए सनम था मगर ए पीर ए हरम
ये शिकन कैसे पड़ी आप के पैरहन में,
कुछ न कुछ आज असीरों ने कहा तो है ज़रूर
एक एक गुल से लिपटती है सबा गुलशन में,
सहल इतने भी नहीं ऐ सितम ईजाद कि हम
थाम लेते हैं गरेबान दिवाने पन में,
सर तस्लीम नहीं बाज़ू ए क़ातिल का जवाब
आख़िरश मारे गए ख़ुद भी मसीहा अन में,
जा रहे हो तो ज़रा देखना तुम भी मजरूह
मेरी आँखें वहीं ज़िंदाँ के किसी रौज़न में..!!
~मजरूह सुल्तानपुरी
जुनून ए दिल न सिर्फ़ इतना कि एक गुल पैरहन तक है
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