क्यूँ न फिर से दौर ए क़दीम में जाया जाए ?

क्यूँ न फिर से दौर ए क़दीम में जाया जाए ?
माँग कर आग घर का चूल्हा जलाया जाए,

बैठ कर गली में करें सब दिल की बातें
रख कर मक्के की रोटी पे साग खाया जाए,

जब दरख्तों पे चढ़ के बेर खाया करते थे
कोई वैसा दरख़्त फिर घर में लगाया जाए,

वो तांगे की सवारी वो घोड़े की टप टप
धीमे सुरों में फिर वही तराना गया जाए,

मेहमान आये घर में और हो गर्मी का मौसम
शक्कर और सत्तू का शरबत उनको पिलाया जाए,

शाम हो तो बच्चों को घर बुलाएं आवाज़ें दे कर
डाल कर मिट्टी का तेल लालटेन को जलाया जाए,

काश ! वो सादगी, वो लोग पलट आएँ वापस
और जदीदियत का जनाज़ा धूम से उठाया जाए..!!


Discover more from Bazm e Shayari :: बज़्म ए शायरी -Hindi / Urdu Poetry, Ghazals, Shayari

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply