जाने क्यूँ आजकल तुम्हारी कमी अखरती है बहुत
यादो के बंद कमरे में ज़िन्दगी सिसकती है बहुत,
पनपने ही नहीं देता कभी बेदर्द सी ख्वाहिश को
महसूस तुम्हे जो करने की कोशिश करती है बहुत,
दावे करती है ये ज़िन्दगी जो हर दिन तुझे भुलाने के
किसी न किसी बहाने से याद तुझे करती है बहुत,
आहट से भी चौक जाए, मुस्कुराने से भी कतराए
जाने क्यूँ अब ये ज़िन्दगी जीने से डरती है बहुत..!!
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