इक मसाफ़त पाँव शल करती हुई सी ख़्वाब में…

इक मसाफ़त पाँव शल करती हुई सी ख़्वाब में
इक सफ़र गहरा मुसलसल ज़र्दी-ए-महताब में,

तेज़ है बू-ए-शगूफ़ा हाए मर्ग-ए-ना-गहाँ
घिर गई ख़ाक-ए-ज़मीं जैसे हिसार-ए-आब में,

हासिल-ए-जोहद-ए-मुसलसल मुस्तक़िल आज़ुर्दगी
काम करता हूँ हवा में जुस्तुजू नायाब में,

तंग करती है मकाँ में ख़्वाहिश-सैर-ए-बसीत
है असर दाइम फ़लक का सहन की मेहराब में,

ऐ ‘मुनीर’ अब इस क़दर ख़ामोशियाँ ये क्या हुआ
ये सिफ़त आई कहाँ से पारा-ए-सीमाब में..!!

~मुनीर नियाज़ी

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